डायरी

किसी ज़ीने पर पुराने दिन बैठे होते…

अच्छा रहता कि बारिश होती और एक दूजे का हाथ थामें सड़क के किनारे कार में बैठे रहते. इस तरह बहुत सा वक़्त साथ में बिताया जा सकता था. हम जरुर एक दूसरे को देख कर हतप्रभ चुप हो जाते. फ़िर थोड़ी देर बाद कार के पायदानों के नीचे से सरक कर कई बातें हमारे बीच आ बैठती. इस तरह मिलने के अचरज को हम गरम कॉफ़ी की तरह सिप करते जाते और इस स्वाद को दुनिया का लाजवाब स्वाद बताते.

विलासी चौराहों की ओर देखते हुए या फ़िर रिक्शा धोते हुए आदमी के बारे में कुछ भी सोचे बिना, इस पर भी बात की जा सकती थी कि उन शहरों को लोग क्यों याद नहीं रख पाते जहाँ उनका कोई महबूब न रहता हो. बातचीत का विषय ये भी हो सकता था कि किस तरह कई बार वे दीवारें भी स्मृतियों में जगह बनाये रहती है. जिनके सहारे चिपक कर एक बार चूमा गया हो. या पूछ ही बैठते कि क्या दीवारें तुम्हारी ओर धक्का देने का गुपचुप हुनर भी जानती हैं?

धूल हवा के पंखों पर सवार रहती और सूरज फूंक मार कर गोल-गोल धूल का खेल खेला करता था. अक्सर तनहा कमरे में दोपहर के वक़्त प्यार करने के ख़्वाब देखने में इतना समय जाया होता रहता था कि ख़ुद पर चिढ होने लगती थी. आले में रखी किताबें और रजिस्टर में महबूब की तारीफ में लिखी हुई चंद बेढब पंक्तियाँ सुस्ताती रहती थी. बड़े कमरों में रखी हुई चीज़ें अपने आकार से अधिक छोटी जान पड़ती थी. इससे प्यार की जगह और बढ़ जाती थी. आपस में बांटने के लिए ऐसी ही कितनी ही बातें बची हुई है.

इन दिनों बहुत बारिशें हो रही हैं. मैं आज वहाँ होना चाहता हूँ. दो बाँहों में न समाने जितने बड़े ‘बुके’ लिए हुए. जिनमें कुछ कार्ड्स रखें हों. उन पर लिखा हो कि प्रेम की हरीतिमा पहाड़ों को ढक सकती है, बाँध लेती है उड़ती रेत को, पानी के रंग को कर देती है, हरा. मेरे दो हाथों में कुछ नर्म गुदगुदे खिलौने भी हों जिनको संभालते हुए तुम्हें चूमना लगभग असंभव हो जाये.

* * *
गुज़ारिशों के बाद भी बारिश नहीं हुई. कितना अच्छा होता कि किसी ज़ीने पर हमारे पुराने दिन बैठे होते और हम मिलते पहली पहली बार फिर से…

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