डायरी

ऐ ज़िन्दगी गले लगा ले

सिंधी केम्प बस अड्डे की सुबह बादलों की ढाल से ढकी हुई हल्की उमस बुन रही थी. मैन गेट के आगे सायकल रिक्शे कतार में खड़े थे. उनके मालिक कम पानी वाले बूढ़े दरख्तों जैसे थे. जिन्होंने इस शहर को पाँव पसारते हुए देखा, जिन्होंने मजदूरी के लिए जयपुर की बूढ़ी गलियों से आशिकी कर रखी थी. उनके काले धूप जले चेहरों पर सफ़ेद तिनके उगे हुए थे. एक रिक्शे की तिरपाल से बनी छत पर प्लास्टिक के दो पुराने चप्पल रखे थे. उसमें सोये हुए आदमी को देखते हुए ख़याल आया कि वह बहुत निर्जीव किन्तु रिक्शे सा ही वाचाल हो सकता है.

इधर सड़क पर चलने को तैयार खड़े रिक्शे के पास चालीस पार उम्र के दो आदमी खड़े थे. दोनों में एक समानता थी कि उनकी हड्डियों पर मांस नहीं था. एक का चेहरा लम्बा और सीधा था. दूसरे का गोल और पीठ के साथ नीचे की और झुका हुआ. लम्बे वाले के चेहरे पर कुछ शिकायतें रखी थी. वे लहरों की तरह होठों के पास से उठती और कान की तलहटी तक जाकर समाप्त हो जाती. उसके होठों के ऊपर चिपकाई हुई नाक के ऊपर दो आँखें रखी थी. उन्होंने दुनिया की चकाचौंध से डर कर गहरे खड्डों में छुप जाने की आदत बना रखी थी. मैंने सोचा कि इस आदमी को अगर अपनी आँखें साफ़ करनी हों तो उनको अँगुलियों से खोज कर बाहर लाना पड़ता होगा.

जिस आदमी का चेहरा गोल था. उसकी शक्ल सूजी हुई थी. उसकी आँखें मेंढकों की तरह बाहर की ओर किन्तु लटकी हुई सी जान पड़ती थी. जैसे शामियाने में प्लास्टिक के गोलों में बुझे हुए बल्ब लगे होते हैं. उन आँखों के बारे में बहुत सोचने पर भी मेरे पास कोई उचित संभावना नहीं थी कि वे ऐसी क्यों हैं ? अपने आप को इस विचार से बहलाया कि वे आँखें दुनिया के और स्वयं के प्रति बेहद उदासीन है. जैसे किसी के पास जीने की कोई वजह ही न हो.

मुझे एकाएक लगा कि मैं यहाँ बैठ कर अपनी उस भेड़ की कहानी को लिख सकता हूँ जो नैतिकता के दार्शनिक ह्यूम से बातें करती थी. जिसने मनुष्यों के बहकावे में आकर अपनी चार में दो आँखें हमेशा के लिए खो दी थी और अब नीचे वाली दो आँखों के सहारे सर झुकाए हुए गोल घेरे की संरचना में जी रही थी. इस गोल चेहरे वाले ने भी भेड़ की तरह नीची नज़र से रिक्शा खींचते अपने अधिकतर साल सड़क की किताब पर लिख दिए होंगे. संभव है कि वे आँखें सड़कों की नैतिकता से आजिज़ आ गयी हों.

वहां तब तक तीसरा आदमी आया नहीं था. वे दोनों किसी नियमित रहस्य पर आपस में मितव्ययी संवाद कर रहे थे. चाय की थड़ी वाले कांच के ग्लास को धोते समय पतले चेहरे वाले ने कोई अत्यंत उदासीन बात कही. वह एक तिरस्कार भरा वाक्य भी हो सकता था. मैंने सिर्फ़ इतना ही पाया कि वे शब्द कसैले थूक का गोला थे. जिन्हें निहायत जल्दी में थूक दिया गया.

वे दोनों सड़क पर खड़े रिक्शे को छोड़ कर दूसरी पंक्ति में खड़े एक रिक्शे तक आये. प्लास्टिक के देसी के पव्वे से एक तिहाई ग्लास में डाला. थोड़ा सा पानी मिला कर पीते समय पतले चेहरे वाले के मुंह में फ़िर कुछ शब्द आ गए. उनको भी किसी खास तवज्जो के बिना सड़क की किताब पर लिख दिया. उन शब्दों कि निर्बाध उत्पत्ति का स्रोत चालीस साल का उसका इतिहास रहा होगा.

तीसरा आदमी मेरी और पीठ किये खड़ा था. उसका कद उन दोनों से कम था और सर के बाल श्याम से श्वेत होने की प्रक्रिया के अंतिम पायदान पार थे. वह निरंतर कुछ संकेत करता हुआ बोल रहा था. जब गोल चेहरे वाले ने ग्लास को मुंह से लगाया तो कोई लहर उसकी सूरत की झील में नहीं जगी. वह उसी तरह झुका रहा. उसने ग्लास को प्रेम की जगह एक लघुतम शुकराना अदा करने के अंदाज़ में देखा या हो सकता है कि वह सड़क को ही देख रहा था.

गोल चेहरे वाले की मौन कुंडली में कुछ और गिरहें पड़ गयी. उसका मुंह शायद बंजर हो चुका था. वहा तिरस्कार न था, कोई लगावट भी न थी और फसलें क्या शब्दों की खरपतवार के निशान भी नहीं थे. पतले चेहरे वाला अब सायकिल के डंडे पर बैठा था और उसकी कमर किसी कूबड़ वाले इंसान जैसी हो गयी थी. ये ज़िन्दगी की कैसी शक्ल है. इसका तर्जुमा कैसे किया जाय ?

तीसरे आदमी ने उस ग्लास का क्या किया. इस पर उन दोनों ने कोई ध्यान नहीं दिया. तीसरे आदमी का ज़िक्र करते हुए मुझे रोटी से खेलने वाले तीसरे आदमी की याद आई जिसके बारे में मेरे देश की सांसद मौन थी. सुबह साढ़े पांच बजे इस तरह बोतल से उगते हुए सूरज को देखना कैसा लगता है, इसे मैं वहीं रिक्शेवालों के बीच बैठ कर लिखना चाहता था. तभी जिस रिक्शे की छत पर चप्पलें रखी थी. उसमें आधा सोया आदमी पूरा जाग गया.

उसने एक गाली दी. वह किस गिरी हुई नैतिकता से आहत था, कहना मुश्किल था. मगर उसके अंदाज़ से वह एक बहुत निरपेक्ष गाली थी क्योंकि उसने बकते समय अपने आस पास किसी की ओर नहीं देखा था.

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