डायरी

अपूर्व, कोई दिन तो सुकूँ आएगा…

मेरे प्यारे अपूर्व,
दीवार की खूंटी पर टंगी फ़कीर की झोली से पुराने सत्तू की तरह मौसम उसी शक्ल और स्वाद में टपकता रहता है. सुबह-ओ-शाम के मातम को ज़िन्दा रखने के सामान की तलाश में अतीत के समंदर में गोते दर गोते लगाता हुआ किसी याद का टुकड़ा बीन लाता हूँ. अभी आखिरी सफ़ा दिखाई नहीं देता. वह सिर्फ़ ख़याल में धुंधला सा उभरता है लेकिन ज़िन्दगी के खर्च के हिसाब का पन्ना काफी लम्बा हो चुका है. ऐसा नहीं सोचता हूँ कि अगले अंधे मोड के बाद ‘दी एंड’ का बोर्ड दिखाई देगा मगर कुछ है जो मुझे हैरान और परेशान करता है.

अक्ल के जोर से ज़िन्दगी के साज़ को कसना मुझे ज़रा सा गैर जरुरी काम लगता है. सुर कहां बिगड़ जाते हैं ? इस सवाल को पैताने रखता हूँ. सिरहाने के पास बीते हुए हसीन लम्हे हैं. भले ही इनका नासेह की नज़र में कोई मोल नहीं है. बस ऐसे ही वक़्त के छोटे छोटे हिस्से गिरते जाते हैं. मैं इस गिरने की आवाज़ से डर कर फिर से अपने अतीत में भाग जाता हूँ. मेरी ख्वाहिशों की कंदील पर जो चमकता हुआ नूर रक्स करता है. वह भी अतीत के रोशनदानों से उड़ कर आता है. मैंने अपने किस्सागोई के हुनर से अतीत को एक ऐसे कारखाने में तब्दील करने की कोशिशें की हैं कि वहां रखे हुए अफ़सोस अमीबा की तरह अपने आप एक से दो हिस्सों में बंटते जाएँ. मुसलसल यादों की पैदावार में बरकत बनी रहे.

आरज़ुओं की सिलाईयों में समय को बुनते हुए, जैसी भी बन पड़ी है. यह ज़िन्दगी मुझे बहुत पसंद है. इस ज़िन्दगी में उसकी सुंदर आँखें चमकती है. वे आँखें जो दुनिया को ठोकर पर रखने का हौसला लेकर ही पैदा हुई थी और अपने ज़ख़्मी पैर मुझे कभी न दिखाती थी. बस ज़रा सवाल के अंदाज़ में पूछती थी कि तुम मेरे पास हो सकते हो या नहीं… मेरे अपने अंदरखाने की अँधेरी गलियों में भटकने के इतने रास्ते थे कि सही जवाब उन पेचदार परीशां रास्तों में खो जाते. वह फिर से रुक कर आवाज़ लगाती थी. उसकी आवाज़ मैं अब भी सुनता हूँ. डूबी हुई, लोचदार और जरुरत से भरी आवाज़.

उस आवाज़ को सुनते हुए अक्सर चौंक कर उठ बैठता हूँ. दफ्तर छोड़ देता हूँ, घर से भाग कर शहर की दुकानों के साइन बोर्ड पढता हुआ टहलता हूँ, छत पे होता हूँ तो बंद कमरे में लौट आता हूँ, कमरे से बालकनी में और इसी तरह हर जगह से घबरा कर एक अंतहीन सफ़र में चलता हुआ जब थक कर बैठ जाता हूँ तो ख़याल आता है कि मैं किसी गोल चक्कर में फंस गया हूँ. अब ये मालूम करना कठिन है कि वह आवाज़ मेरे आगे है या पीछे ? मैं याद के टुकड़ों के पीछे भाग रहा हूँ या फिर वे नश्तर जैसे टुकड़े किसी गाईडेड मिसाइल की तरह मुझ तक आ रहे हैं.

ज़िन्दगी के इस छोटे से मंज़र को कई तरीकों से लिखते हुए पाता हूँ कि मेरी तकलीफें गैरवाजिब नहीं है कि दुनिया में कुछ और भी लोग ऐसे ही मसहलों में गिरफ्त है. उनको भी इस नासमझी ने घेर रखा है कि वो शय क्या थी, जो एक बार आँखों में कौंध कर उम्र भर के लिए तनहा कर गई ? मेरी अक्ल किस पेड़ के नीचे और किस दिन आँख खोलेगी समझ नहीं आता. बस ऐसे ही गुंजलक ख़यालों की चादर में बेकस, बेबस और उदास बैठा रहता हूँ. अचानक कोई रौशनी की शहतीर मेरे सर से टकराई और मैंने ये फैसला किया कि उससे मुलाकात के आख़िरी लम्हे को लिख कर दोस्तों से बांट लूं. मेरे दोस्तों के घरों की दीवारों पर यह अफ़साना चमकता होगा और मैं इसी ख़ुशी में आगे से उसे याद न करने का हौसला पाकर, याद की लेनटर्न को बुझा दूंगा.

तुम्हें पता है अफ़सोस कभी पीछा नहीं छोड़ते. वे दो से चार होते हुए बददुआ की तरह असर दिखाते हुए हमें घेर लेते हैं. पिछले सालों से मैं जिन दोस्तों से किस्से कहानियां शेयर कर रहा था. उनमें से कुछ सोये हुए, कुछ अपने शहरों से दूर ज़िदगी को आसान बनाने की मशक्कत में मसरूफ, कुछ गाफ़िल और कुछ अपने नोलिज के बोझ तले दबे हुए मिले. उन्होंने मेरी दरख्वास्त को अनसुना कर दिया. मैंने दूसरी रात जब तीसरा जाम हाथ में लिया तो मुझे पहले हैरत और उसके बाद नफ़रत हुई कि इसी शय को दोस्ती, मित्रता या ऐसा ही कुछ कहते हैं तो मैं इसे ज़िन्दगी में सबसे दोयम दर्ज़े की चीज़ घोषित करता हूँ.

मेरे पास कोई बीस पच्चीस मेल पते हैं. जिन्होंने बड़े दिल से गुज़ारिशें की थी कि हथकढ़ पर कमेन्ट का ऑप्शन खोलिए. हम आपके अहसासों की क़द्र करते हैं और ज़िन्दगी के खट्टे मीठे स्वाद को बांटना चाहते हैं. तीसरे जाम के वक़्त उन ख़त नवीसों का ख़याल भी आया. इसके ठीक बाद मैंने हसरत भरी निगाह से खुद से दूर बैठ कर खुद को देखा. लौट कर खुद तक आया और अपने ही माथे पर हाथ फेरते हुए कहा. बस वही एक साथ है. वही हर जगह है. इसके बाद मैंने अपना स्टेट्स लिखा और इन फ़रेबआलूदा ज़हीन लोगों से विदा लेकर सो गया.

मगर मुश्किलें फिर भी साथ नहीं छोडती. सुबह जब पहली दफ़ा देखा तो पाया कि मेरे कद्रदान नसीहतों के बजूके हो गए हैं. मुझे हर उम्मीद, हर तवक्को और हर हसरत को बुझा देने को कह रहे हैं. इनमे से अधिकतर वे दोस्त हैं जिन्होंने मेरी अर्जी को ख़ारिज किया हुआ है. उनके सवालात भी बेहतर थे कि हालाँकि मैंने इसे शेयर नहीं किया है फिर भी आप बताएं कि कोई इसे क्यों शेयर करे ? अपूर्व जानते हो दुनिया के हुनरमंद लोगों के पास अपने तजुर्बे से जुटाए हुए वे सवाल होते हैं कि अगले को शिकस्त देकर ही दम लेते हैं. मेरे पास इसका एक ही जवाब था कि मैं आपको अपना दोस्त समझ बैठा था.

मेरे स्टेट्स पर तुम्हारा लिखा फैज़ साहब का शेर पढ़ा तो मुझे उस दिन की याद आई. जब तुम लोग ब्लॉग छोड़ कर जा रहे थे और मैंने अपने आंसुओं को पौंछ कर इल्तज़ा की थी. जैसे मेरा साया ही रूठ कर जा रहा हो. दिसम्बर के उन दिनों में ये अहसास मुझे कई दिनों तक सताता रहा कि लोग जिन्हें वर्च्युअल समझते हैं. मैं उनके लिए क्यों रो रहा हूँ. ज़हन में उठते सवालों को बांध कर मैं लिख पाया था कि दोस्तों ब्लॉग छोड़ कर न जाओ, कल कौन लिखेगा कि ये दुनिया ऐसी क्यों है ? ये मैंने इस लिए लिखा था कि इस दुनिया की बेरहम रवायतों से नफ़रत मुझे जिलाए रखती है. दोस्त मुझे बचे रहने में मदद करते हैं. हमारे होने से ही आज एक अरसे बाद भी तुम बचे हुए हो किसी मासूम बच्चे की पेशानी के नूर की तरह मेरे सीने में …

वो किस करवट सो पाती होगी, उसके घर में सूरज किधर उगता होगा, आँखों के भीगे मौसम को किस तरह जीत पाती होगी, उसके साफ़ चमकते दिन पर पैबंद की तरह मेरी बातें कैसी दिखती होगी, कोई दोस्त न होगा तो क्या होगा, हम मिल जाएँ किसी दिन तो क्या कीजियेगा, कभी वो बेचैन होकर कह दे कि मैं भी उदास हूँ तो उसकी आँखें किस टिशु पेपर से पौंछियेगा, कभी वह एक सवाल करने लगे कि तुम मुझसे उम्र में बड़े थे तो नासमझ कैसे हुए, हाथ की जिन रेखाओं से तक़दीर को पढने का ड्रामा करते थे, उस हाथ को छोड़ते हुए तुम्हें अफ़सोस क्यों न हुआ, तुम एक मुकम्मल पता लेकर दुनिया में क्यों न आये कि मैं जब चाहती तुम तक आ सकती…. ऐसे सवालों से घिरा हूँ.

वासी शाह के शेर में वही मुस्कुराती है. फैज़ के इंकलाब में भी उसी को पाता हूँ. लोह-ए-अज़ल यानि धर्म के आखिरी बड़े उपदेश में उसी का ज़िक्र है. कृष्ण, यज्ञाद भवति पुर्जन्यः में कल्याणकारी, निष्काम, निष्पाप और विघ्न हरण करने वाली जिस पवित्र यज्ञ ज्वाला की बात करते हैं वह उसी का अनंत रूप है. वह मेरे भीतर है एक भीगे हुए आंसू की तरह, वह मुझसे जुदा नहीं, मेरे साथ है. उसे मेरी बेवजह की बातें पसंद है. इसीलिए खुद से कहता हूँ. “चल छोड़ ना, जो तेरा था वो मिल गया…” अब किसी से कोई उम्मीद नहीं. शराब के प्याले को औंधा रखा हुआ है. अगले शनिवार की रात तुम आना. मैं तीन शराबों को मिला कर ‘अर्थक्वेक’ नामक कॉकटेल बनाऊंगा और हम दोनों पीकर चित्त हो जाएंगे फिर कोई सवाल कैसे सताएगा…

आज सुबह सात समंदर पार से आई तुम्हारी भीगी हुई चिट्ठी को कई बार पढ़ते हुए दूर खड़े अरावली से बिछड़े हुए पहाड़ों को देखते हुए सोचता हूँ कि उसकी याद न होती तो ज़िन्दगी क्या होती.

तुम्हारा दोस्त.

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