कविता, प्रेम

प्रेम का कोई तुक नहीं होता

उसे तो बात कहने का भी सलीका न था. साँझ ढले रात की चादर पर खुद को बिखेर देता. सूखे पत्तों के टूटने जैसी उसकी आवाज़ थी. कहता था कि मुझे रात के माथे की सलवटें गिनना आता है. इसी कारण देर तक जागने की आदत हो गयी है. सुबह अनार के फूलों पर आने वाली पतली लम्बी चोंच वाली नीले रंग की चिड़िया उसे कहती सुबह हो गयी है. वह कहता इतने सवेरे कैसे उठ जाती हो, तुम किसी से प्रेम नहीं करती क्या ? चिड़िया कहती हाँ करती हूँ. चिड़िया ने उसे एक अतुकांत गीत सिखाया. क्योंकि प्रेम का कोई तुक नहीं होता.

हर शाम संवरती थी, तेरे साथ से महकती थी
जिसमें कांटे चुने, जिसने सपने बुने
ये बीते दिनों की एक बात है
वो लड़की भी नहीं रही, वो दिन भी तो बदल चुके
और मैं भी कोई और हूँ….

बारहा न पूछो हवाओं से, अनमनी सी घटाओं से
इस किस्से में आएगा उसका नाम भी
जिसके हाथों उसका खून हुआ, ज्यों मरते हैं ख्वाब हज़ार बार
वो ख्वाब भी नहीं रहे, वो रुत भी तो बदल चुकी
और मैं भी कोई और हूँ…

ये सवाल ही गलत है कि ना सूद ना उधार थे
क्या देखना, क्या पूछना, उसके ज़ख्म बेहिसाब थे
गणित भी क्या कीजिये, झड़ चुके सब पात का, बीते हुए हालात का
वो सूखे पात भी नहीं रहे, वो हालात भी तो बदल चुकी
और मैं भी कोई और हूँ…

मोती तो सारे बह चुके, ना बाकी कोई आस है
मुझे शाम से अब इश्क़ है, तुझे सुबह की तलाश है
सुबह की तलाश, सुबह की तलाश है….

और वह किसी खोयी हुई उम्मीद की तरह लौट आई. घन गर्जन के बाद का सन्नाटा घनीभूत हो गया. सजल आँखों की कोरों पर उपत्यकाओं की ख़ामोशी ठहर गयी. खुशबुएँ तितलियाँ बन कर उड़ गयी. हसीन हैरानी की तरह दूर किसी देश के गुप्त खजाने के बीजक की कुंजी सामने खड़ी थी. वह अभागा गाने की जगह चिल्लाने लगा…

तुम जाओ कि रंग दू उदास शाम को
तुम जाओ कि भर दूं यादों के जाम को
तुम जाओ कि आवाज़ दूं तेरे नाम को
तेरे नाम को, तेरे नाम को, तेरे नाम को….

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