फ़रीद अयाज़, बातें बेवजह

हर किसी का खेल नहीं है…

शाम अभी आई नहीं थी. दूर पेड़ों की टहनियों पर पंछी चौंक जाने की तरह चहकते और चुप हो जाते थे. ये एक लम्बी बेंच थी जिस पर कोई भी बैठ सकता था. वह भी बैठी थी. सामने रखे पानी के आईने में डोलती हुई परछाइयों को देखती हुई. कभी हवा का झोंका आता तो सीढ़ियों की धूल गोल गोल नाचती और फिर ठहर जाती. ऐसी ही एक शाम उसने ख़त में लिखा था कि तुम मेरा साथ कभी मत छोड़ना

उसे लगा कि वह फिर से सुन पा रही है. मैं चिड़ियों के लिए रखे चुग्गे की तरह बिछ जाऊं तुम्हारी राह में, झील के किनारे की सख्त और गीली सीढ़ियों में ढल जाऊं, हो जाऊं उड़ता हुआ पंख, तुम्हारी बेटी के हाथ जितना कोमलआवाज़ किसी अनजान दिशा में खो गई. जैसे मुहब्बत खो जाया करती है, रेगिस्तानी पगडंडियों की तरह. फिर कहीं से बादल घिर आये और उसके चेहरे को ढांप दिया.

अगर मैं बना सकता शब्दों को चाकू
और खरज की आवाज़ से गढ़ सकता मजबूत मूंठ
तो पीछे से बाँहों में भरता हुआ
तुम्हारे कान में टूटे पत्तों के हल्के शोर सा बजने लगता
आई लव यू… आई लव यू… आई लव यू…
और फिर गाल और कान के बीच चूमता हुआ
रेत देता तुम्हारा गला.

और इस तरह मैं दुनिया का पहला आदमी हो जाता
जिसने पहली ही बार में कर ली थी सफल आत्महत्या.

तुम इसकी तफ़सील में न जाना
कि मैं कभी कभी ऐसा सोचता हूँ, कि बातें बेवजह हैं और बहुत सी हैं

* * *
फ़रीद अयाज़ साहब को सुनोगी ?

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