केन्द्रीय विद्यालय

जली तो बुझी ना, कसम से कोयला हो गयी हाँ…

वे हर साल क्लासिक हो जाने को बेताब रहा करते थे. मोहिनी अट्टम के बाद टी एस इलियट की कविता पर लघु नाटिका, शेक्सपीयर के नाटक के बाद भरत नाट्यम ले कर आते और सुदूर किसी अफ्रीकी देश के लोक नृत्य को करने के लिए कोवों के पंखों से बना ताज पहन, कमर पर पत्ते बाँध कर आदिवासी समुदायों के लोक नृत्य लूर जैसा प्रदर्शन करते हुए वैश्विक हो जाया करते. अंग्रेजी नाटक करते हुए बच्चों में माईकल मधुसुदन दत्त जैसा ब्रितानी एसेंट कभी नहीं आता लेकिन वे शब्दों को खोखले मुंह से गले में ब्रेड फंसी बिल्ली की तरह बोलते जाते.

मैं हर बार तो नहीं जा पाता हूँ लेकिन कई बरसों से विद्यालय प्रबन्धन समिति का सदस्य होने के नाते प्रेमपूर्ण निमंत्रणों को निभाने की कोशिश करता हूँ. इस शाम के तीन घंटे बड़े सुन्दर  होते  हैं. मैं प्रतिभागी बच्चों से संवाद करने में ये समय बिता दिया करता हूँ. मेरी जिज्ञासाएं अक्सर उनकी वेश भूषा और आइटम के कंटेंट को लेकर होती है.

साल दर साल बच्चे, शिक्षक और प्राचार्य बदलते रहते हैं लेकिन वह खुशबू नहीं बदलती. अभिभावक कहते हैं कोई पढाता ही नहीं है. प्राचार्य अपने उद्बोधन में कहते हैं इस रेगिस्तान में पीने के पानी का प्रबंध करने के लिए उनको कितनी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा और अंत में वी एम सी अध्यक्ष कार्यक्रम की सराहना करते. विद्यालय के प्रबंधन और विद्यार्थियों को परिश्रम पर शाबासी देते और अपने पावर से अगले एक दिन का अवकाश घोषित कर दिया करते.

कल रात मेरे आगे बैठी हुई पहाड़ी महिला अपने हाथ में ली हुई एक छोटी बुगची में रखे हुए स्नेक्स अपने पति को बड़े प्यार से खिला रही थी. ये मेमल्स के बिहेवियर का हिस्सा है कि नर अक्सर बच्चों के लालन-पालन में बेहद उदासीन होते हैं और उनसे जुडी छोटी बातों पर बड़ा गुस्सा करते हैं. वे अपनी सहभागिता पर अहसान से अकड़ जाया करते हैं. मेरी पत्नी ने इस समस्या से कुछ इस तरह छुटकारा पाया है कि वह अपनी किसी सखी को राजी कर लेती है और उसके साथ इस तरह के कार्यक्रमों का आनंद उठाया करती है. कल भी वह ऐसे ही आगे की किसी पंक्ति में बैठी थी.

दिन के तापमान में गिरावट हुई है और वह चालीस के आस पास आ गया है. इस वजह से शाम की हवा सुकून भरी थी. मंच से क्लासिक आइटम गायब थे. मंगल पांडे, तात्या टोपे और झाँसी की रानी के बलिदान पर नाटिकाएं मंचित हुई. मंच के पीछे से सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता पढ़ते हुए स्कूल टीचर भावुक हो गयी. मंगल पांडे वाली नाटिका तैयार करवाने वाले सर, ये कहते हुए रोने जैसे हुए जा रहे थे कि सब दर्शक रो रहे हैं. इसके बाद भी आज़ादी की स्मृतियों और चेतावनियों का सिलसिला जारी रहा. बच्चों ने एक कव्वाली गई “आज़ादी मुफ्त नहीं मिला करती…” और इसके बाद भी एक और देशभक्ति भरा गीत.

कार्यक्रम में एक ही विचार हावी था, आज़ादी. हम सब के भीतर इस विचार ने करवटें लेनी आरम्भ कर दी है. विद्यालय के टीचर्स और प्राचार्य ने यकीनन ये थीम न बनाई होगी किन्तु भ्रष्ट होती व्यवस्था और बढती जा रही विषमताओं के विरूद्ध सबका मन एक होता जा रहा है. मंच पर एक गीत के दौरान चिकनी मिट्टी से अपने सर को महात्मा गाँधी जैसा बनाये हुए और लंगोटी धारण किये एक नन्हा बालक लाठी लिए खड़ा हुआ था, पास में दुगनी ऊँचाई वाला एक क्रांतिकारी था और उसके पास में उससे भी लम्बा एक टोपी वाला सरदार खड़ा था, भगत सिंह. मैंने प्रिंसिपल साहब की खैर मनाई कि इस बढ़ते हुए क्रम पर दिल्ल्ली से कोई स्पष्टीकरण न आ जाये.

मैं बेमन से कार्य्रक्रम में गया था किन्तु उसके विपरीत अदम्य साहस से भर कर लौटने को था कि प्राईमरी विंग की नन्ही बच्चियों का समूह मेरे पास से गुजरा. इन्होने एक्शन रीप्ले फिल्म के गाने पर बेहद चार्मिंग डांस किया था. एक दक्षिण भारतीय परिवार की काले घुंघराले बालों वाली पिंक ड्रेस पहने सुदर सी गुड़िया को मैंने रोका और आंग्ल भाषा में कहा. “तुम कमाल हो, ऐश्वर्या से अच्छा नाचती हो.” आओ एक स्टेप फ़िर से हो जाये… लगी है बुझे ना कसम से तौबा हो गयी हाँ, मिला ना कोई ऐसा मेरे सपनों के जैसा, छान के मोहल्ला सारा देख लिया…

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