ख़त, हबीब वली मोहम्मद

ऐसी भीगी सुहानी रात में

वह बड़ी खिड़की कमरे के पश्चिम में खुलती थी. रेगिस्तान के इस छोर पर बसे क़स्बे के नितांत आलसी लोगों के बीच दिन भर खुली रहा करती. चार भागों में बनी इस खिड़की से रात को ठंडी हवा आती थी. वह सड़क पर खुलने वाले मेहमानों के लिए बने कमरे में थी. उस कमरे का उपयोग बहुत कम होता था. हर सुबह इसमें एक छोटी सेंटर टेबल, लकड़ी का तख़्त, एक प्लास्टिक के फूलों वाला सदाबहार खिला एल्युमिनियम का छोटा सा गमला और पास के आले में अखबार बिछा कर उन पर रखी एक दो पुस्तकों को झाड़ कर साफ़ किया जाता और फिर दिन भर सूना पड़ा रहता.

मुझे उस कमरे की खिड़की बड़ी भली लगती थी कि उससे बाहर आते – जाते हए लोगों को देखा जा सकता था. घर हमेशा ठहरा हुआ सा जान पड़ता और मेरी ऊब को बढ़ाता रहता था. खिड़की के सामने बाहर गली के दूसरे छोर पर एक विलायती बबूल का पेड़ था. उसकी छाँव बहुत हल्की हुआ करती थी. जिन दिनों लू नहीं चलती उसके नीचे बैठ कर धूप से बचा जा सकता था. मैं भी घर की ठंडी तन्हाई को बाहर बबूल के नीचे की कुरकुरी छाँव से केश कर लेना चाहता था किन्तु कभी कर नहीं पाया. इसलिए सदा ही उसी खिड़की के पास बैठा हुआ दिन के सपने देखा करता.

उस गली में एक डाकिया भी आया करता था. खाकी वर्दी वाले उस इंसान की सूरत मुझे दुनिया में सबसे हसीन लगती थी. मेरे दोस्त क़स्बे के बीच बने हुए कस्टम के क्वाटर्स को देख कर अचरज से कहा करते थे. देखो इसमें फिल्मों का मशहूर चरित्र अभिनेता देव कुमार रहा करता था और वह सात फीट लम्बा था. मुझे यकीन था कि वे सुनी हुई बात को आगे बढ़ा रहे हैं लेकिन मैं सोचता था कि हमारे डाकिये से बेहतर कद काठी का गहरी आँखों वाला कोई न हुआ होगा. वह मुझसे बेहद खुश रहता कि मैं हमेशा उसके इंतजार में घर के बाहर खड़ा रहा करता, उसे कभी मेरी चिट्ठी देने के लिए अपनी सायकिल से उतरना ही नहीं पड़ता वह बस एक पांव को नीचे टिकाता और चिट्ठी देता और चला जाता.

चिट्ठियां अक्सर उसी खिड़की के पास बैठ कर पढता था और फिर एक लम्बी थकान भरी आह के साथ लकड़ी के तख्ते पर लेट जाता. वे ख़त कभी पुराने नहीं होते थे कि उनको बार बार किसी कविता की तरह पढ़ा जा सकता था. अद्भुत रहस्यों से भरी और बेहद डरावनी चीज वही एक भूरे रंग की दस्ती फ़ाइल हुआ करती थी जिसमें करीने से बंधे हुए ख़त और हर एक ख़त के शुकराने में कई कविताएं लिखी थी. उस फ़ाइल को थामे हुए अकूत सपनों की अविराम चलने वाली पगडंडियों पर मेरा मन भागा दौड़ा ही जाता. कोर्स की किताबें मेरा इंतज़ार करती रह जाती. मैं खाली पन्नों पर बबूल की मिमझर, गली से गुजरे लोगों और दूर खड़े नंगे पहाड़ के बारे में लिखता रहता.

आपने कुछ ऐसे बच्चे देखे होंगे जिनका पढने में बिल्कुल मन नहीं लगता, वे सिर्फ खेलने या एकांत में बैठे रहने के लिए अक्सर गायब हो जाते हैं तो उनसे मेरा चेहरा मिलता है. मैं हद दर्ज़े का पढाई चोर रहा हूँ. बाहर की दुनिया के लिए इतना लालायित रहा हूँ कि भरी धूप में भी उस खिड़की को बंद करना मुझे पसंद नहीं आता था. जब भी मौका मिलता मैं लगभग सारा ही दिन घर से बाहर बिताता रहा. मुझे एक बात हमेशा आश्चर्य में डालती है कि मैं घर से भाग क्यों नहीं गया ? ऐसी क्या चीजें थी जो मुझे रोकती रही. कभी ख़याल आता है कि वो खिड़की फिर लगता है कि नहीं वे ख़त… हाँ अगर मैं भाग जाता तो उन ख़तों का जवाब कौन देता ?

चिट्ठियां खो गई हैं मगर उनमें महकने वाले शब्द इस ग्लास पर जमी बूंदों की तरह बनते और मिटते जाते हैं. किसी का मासूम चेहरा आँखों में चमकता है. जाने अब वह सूरत कैसी हो गई होगी ? जाने उसके दिल में प्यार था भी या नहीं ? … अट्ठारह साल के बच्चों अगर तुम मुझे पढ़ते हो या तुम्हें किसी से मुहब्बत है तो इसे सुनों कि हबीब वली मोहम्मद के इस नग़मे को मैंने जवान होने और उसे खो देने के बरसों बाद तक रेडियो पर प्ले किया है. मैं इसके कॉपी राईट को नज़र अंदाज़ करते हुए यहाँ लगा रहा हूँ कि मुहब्बत में सब जायज है…

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