बातें बेवजह, शुजात हुसैन

बेहिजाब तन्हाई में

उदासियाँ अपने पहलू में सकेरता हूँ
और हथेलियों के आईने में उगती हैं तस्वीरें
फिर बेहिजाब तन्हाई में देखता हूँ कि
तेरे जूड़े में खिलती शाम से धुंधला गए हैं चमेली के फूल
और मैं छीजती शाम की आखिरी कोर पर बैठा हुआ
ओढ़ता हूँ तेरी सांसों के लिबास…

बच्चे जब स्कूल चले जाते हैं
या दफ्तर में अलसायी दोपहर पसरने लगती है
जाने ये कैसे ख़याल आते हैं …बातें बेवजह हैं और बहुत सी हैं

* * *

सुबहें अब भी जरा देर से हुआ करती हैं. रात को सपने सताते रहते हैं. सपने में जंगल है. संकरे रास्ते हैं. मैं किसी अपघाती सा घूमता हूँ. कुछ टहनियों को हटाते ही खुला मैदान आ जाता है और दो एक पत्तियां सब कुछ अँधेरे से ढक देती है. मेरे साथ कोई है जिसकी शक्ल नहीं दिखती. सपने में दुस्साहस है मगर प्रेम नहीं है, सहवास नहीं है. बेचैनी में जागता हूँ और कोसता हूँ. उजाले में मकानों की पहचान गढ़ता हूँ. उलझे हुए धागों को भूलने के लिए म्यूजिक प्ले कर देना चाहता हूँ. सबकी की एक प्ले लिस्ट होती है मेरी भी है. इसमें शुजात हुसैन साहब की इस ठुमरी को कब से सुन रहा हूँ याद नहीं मगर ये चरवाहे सी है जो सुकून की भेड़ों को घेर लाती है.

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