बातें बेवजह

धुंध में खोया हुआ ख्वाहिशों का घर

मेरे दोस्त, बातें बेवजह हैं और बहुत सी हैं….के जरिये जो बातें करता था वे बहुत दिनों से याद नहीं आई. ज़िन्दगी के आधे रास्ते के बाद हौसला रहता नहीं इसलिए इस बार बिछड़ने की बात चले तो याद दिलाना कि उस घड़ी कुछ भी साथ नहीं देता. उस घड़ी कोई रंग कोई रौशनी नहीं होती. उस घड़ी कोई आसरा कोई सहारा नहीं होता कि मुहब्बत के चले जाने के साथ सब चला जाया करता है. मैंने जाने कितनी बार खोये हुए रास्तों को देखा है जाने कितनी बार टूटा हूँ. इन दिनों फिर से मौसम के खिलने की आस है किसी के आने का वादा है…

धुंध में खोया हुआ ख्वाहिशों का घर

उन दिनों हरे दरख़्त थे
दोपहर की धूप थी, पेड़ों की गहरी छाँव थी
डूबती शामों के लम्बे साये थे
रास्ते थे, भीड़ थी, दफ्तर भी थे, केफे भी थे.

पलकों की कोर से इक रास्ता
जाता था ख्वाहिशों के घर
आँखों में रखे हुए तारे रात के, होठों पे लाली सुबह की.

मगर एक दिन अचानक
कुछ बुझी हुई हसरतों की आह से, कुछ नाकाम उम्मीदों के बोझ से
उसने हेंडिल ब्रेक लगाया, विंडो के शीशे को नीचे किया,
एक गहरी साँस ली, मगर जाने क्यों… वह उतर ना सकी कार से.

हालाँकि इसी रास्ते पर
उन दिनों भी सूनी बैंचें थी, पीले पत्तों का बिछावन था
और टूटे हुए कुछ पंख थे.

बातें बेवजह हैं और बहुत सी हैं…

* * *

मैंने पहले भी बेवजह और बहुत सी बातें लिखी थी. तुम उनको फिर से सुनना चाहो तो मुझे मेल करना. मेरा पता साइडबार में लाल अक्षरों में दर्ज है. एक पंडित कहता था तुम्हारी कुंडली में राहू ऐसे घर में बैठा है कि तुम झूठ बहुत बोलोगे. मैंने भी उसे बताया कि मेरी झूठी कहानियां लोगों को बहुत सच्ची लगती है. तुम्हें झूठ के इस कारोबार के बीच एक सच्ची बात कहता हूँ कि तुम्हें सीने से लगाने को जी चाहता है, ये अगर झूठ भी हो तो क्या बुरा है ?
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