केन्द्रीय विद्यालय, पापा, पेन्सिल, बी बी एल भटनागर, वसीम बरेलवी

पेंसिलें

आज के बाद स्कूल ले जाने के लिए तुम्हें आधी पेन्सिल मिला करेगी. पापा ने ऐसा कहा तब मैं बहुत डर गया था. मैं इंतज़ार करने लगा कि अब वे कहें स्कूल जाओ. उस सुबह मैंने बताया था कि मेरी पेन्सिल खो गई है. ऐसा एक ही सप्ताह में दूसरी बार हुआ था. मुझे याद नहीं कि उन दिनों पेन्सिल की कीमत अधिक हुआ करती थी या मेरे पिता को तनख्वाह कम मिलती थी या फिर वे मुझे अपनी चीजों को संभाल कर रखने का हुनर सिखाने के लिए प्रयत्न किया करते थे.

पेन्सिल से कोई प्रेम नहीं था. मुझे पढना अच्छा नहीं लगता था. क्लासवर्क और होमवर्क की औपचारिकता को पूर्णाहुति देने के सिवा पेन्सिल किसी काम नहीं आया करती थी. उसकी लकड़ी का बुरादा बेहद फीका और ग्रेफाईट स्वादहीन हुआ करता. उनको छीलने से फूलों के आकार का जो कचरा बनता था अक्सर किसी उकताए हुए मास्टर की खीज निकालने के सामान में ढल जाता. मैं पेंसिलों को संभालने से ज्यादा प्यार खुली आँखों से सपने देखने को करता था. उन सपनों में बेहद सुंदर लड़कियाँ हुआ करती और किसी ताज़ातरीन अपराध की खुशबू फैली रहती. मेरे इन दोशीज़ा सपनों को स्कूल का कोलाहल या रेल की पटरी के टुकड़े से बनी हुई घंटी क्षत-विक्षत कर देती थी. मुझे वही सिक्वेंस फिर दोबारा कभी नहीं मिलती.

मेरी खोयी हुई पेंसिलें कभी वापस नहीं मिलती थी. अपनी चीजों को संभालने का सबक नहीं सीख पाया और ज़िन्दगी भर पेंसिलें खोता ही रहा. उनके खो जाने का दुःख होता था. मैं बहुत उदास हो जाया करता था कि इस बेकार बात के लिए कभी भी डांट पड़ सकती है. सब खोयी हुई पेंसिलें मेरी स्मृतियों में हमेशा दस्तक देती रहती थी. वे काले और लाल रंग की धारियों वाली पंचकोण पकड़वाली हुआ करती थी. उन पेंसिलों से कान खुजाना मना था. पेंसिलों से दीवारों पर लिखना भी मना था. उनसे कुछ खूबसूरत नाम लिखे जा सकते थे मगर डरता था.

सात आठ साल तक इन लगातार खोती जा रही पेंसिलों से मुक्त हो जाने के बाद एक दिन पापा के एक दोस्त ने मुझे शाम को अपने घर बुला लिया. “बेटा अब तुमको स्केच करना सीखना है” ऐसा सुनते हुए, मैंने देखा कि वे एक नाटे कद के आदमी है. उन्होंने तहमद पहनी हुई है. उनके सिर के कुछ बाल गायब हैं और बाकी किसी राजघराने के गवैये की तरह पीछे से वन लताओं से आपस में उलझे हुए हैं. आज मैं कहूँ तो वे बाल किसी कविता जैसे थे. उनके चेहरे पर तेज था. वे पहले ही लुक में एक डीप आदमी लगते थे.

दो महीने तक मैं रोज शाम को उनके पास जाता था. वे मुझसे पंजा, पांव, आँख, भोहें, कोहनी जैसे शरीर के अंग बनवाते रहे. उन्होंने अगले पायदान पर मुझे एक किताब दी जिसमें सब नंगे स्केच थे. उनको देखना और फिर उन पर काम करना बेहद मुश्किल था. मैं तब तक नौवीं कक्षा में आ चुका था और मेरी जिज्ञासाएं चरम पर थी. मैंने कुछ और महीने फिगर पर काम किया. वे मुझसे खुश तो होते लेकिन मुझमे ऐसी प्रतिभा नहीं देख पाए थे कि मेरे जैसा शिष्य पाकर खुद को भाग्यशाली समझ सकें. एक दिन मैंने कहा “मुझसे पेंसिलें खो जाती है शायद मुझे इनसे प्यार नहीं है.” उन्होंने पीक से मुंह हल्का करके कहा “बेटा ये राज बब्बर फाइन आर्ट में मेरा क्लासफेलो था, इसने लिखित पर्चे नक़ल करके पास किये है मगर देखना एक दिन फिर से ये पेन्सिल जरुर पकड़ेगा.”

मैं पेन्सिल से कोई चमत्कार नहीं कर पाता था. उनकी नोक की साइज़ बढती गई मगर मेरा हाथ तंग बना रहा. हम शहर से बाहर गए ताकि कुछ स्टिल स्केच कर सकें. वहां वे अपना काम करते और मैं सोचता था कि अपनी पसंद की लड़की का पोर्ट्रेट बना कर उसे अचंभित कर दूंगा. सीले सीले से रहने वाले उस फर्स्ट फ्लोर पर मेरे गुरूजी ने मुझे एक ऑयल पेंटिंग दिखाई थी. उनके हिसाब से वह एक अधूरी पेंटिंग थी और वे लगातार उस पर काम करते जा रहे थे. मेरी समझ कहती थी कि वह उनकी महबूबा है. इसके अलावा उनके पास बहुत सी सुंदर पेंटिग्स थी. वे हमेशा मुझे लुभाती रही. उनके नीचे नाम लिखा होता ‘राकेश भटनागर’. मैं अक्सर काम कम करता और ऐसी सुंदर पेंटिंग्स के नीचे अपना नाम लिखे होने के सपने ज्यादा देखता था.

मैं कभी अच्छी तसवीर नहीं बना पाया. नंगे स्केच का पुलिंदा, जो मेरे अभ्यास से जन्मा था. उसे मैंने दो चार साल संभालने के बाद जला दिया. पेंसिलों की मैंने जितनी उपेक्षा की उतने ही चित्र दूर होते गए. खुद को राकेश लिखने वाले बृज बिहारी लाल भटनागर सम्भव है कि अभी भी आगरा के आस पास किसी केन्द्रीय विद्यालय में मुझसे अच्छा शिष्य खोजते होंगे या फिर रिटायर होकर उस पेंटिंग को पूरा करने में लगे होंगे. मैं चित्रकार नहीं हो पाया लेकिन उनसे बहुत प्यार करता हूँ.

मेरे दो बच्चे हैं. उनको कुछ हो जाता है तो मुझे पेंसिलें याद आने लगती है. सोचता हूँ कि मेरे पिता अफ़सोस करते होंगे कि जो नालायक कभी अपनी पेन्सिल नहीं संभाल पाया वह बच्चों को क्या संभालेगा. मुझे आज कल कुछ सूझता ही नहीं. मैं कभी सीढ़ियों को याद करने लगता हूँ कि मैंने लोगों की सबसे सुंदर तस्वीरें सीढ़ियों के साथ देखी है. कभी मुझे यकीन होने लगता है कि मुहब्बत की एक्सपायरी डेट नहीं होती. कभी सोचता हूँ कि हमें पेंसिलों को भी संभाल के रखना चाहिए ताकि एक दिन जिंदगी में सबसे प्रिय व्यक्ति की तस्वीर को पूरा कर सकें. वसीम बरेलवी साहब का ये शेर मेरी यादों के लिए बड़ा माकूल है.

किताब-ए-माज़ी के औराक उलट के देख ज़रा
ना जाने कौनसा सफ़हा मुड़ा हुआ निकले !
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