गुलाम अली, छोटे सरकार, नासिर काज़मी, पापा, विकास

रास्ते सलामत रहें

उन्होंने सबसे पहले पत्थर की नक्काशीदार रेलिंग को तोड़ा फिर गोल घेरे में बनी दीवार को उखाड़ फैंका. इस तरह चौराहे का घूम चक्कर नंगा दिखाई देने लगा. अगली सुबह उन्होंने बाहर के बड़े घेरे को इस तरह साफ़ कर दिया जैसे यहाँ इतना बड़ा सर्कल कभी था ही नहीं. मैंने अपने जीवन के बेशकीमती सालों में उदासी और ख़ुशी के अहसासों को साथ लिए हुए इस चौराहे को देखा है. अब स्वामी विवेकानंद की आदमकद मूर्ति और एक हाई मास्ट लाईट का पोल रह गया है. इन्हें भी अगले कुछ दिनों में हटा लिया जायेगा.
मेरे स्कूल के दिनों से ही ये चौराहा साल दर साल संवारा जाता रहा है. युवा दिवस और चिकित्सा महकमे की योजनाओं के बारे में जागरूकता रैली निकालने के लिए बच्चों को स्कूल से उठा कर यहाँ लाया जाता रहा है. वे बच्चे स्कूल के जेल जैसे माहौल से बाहर आकर भी यहाँ यकीनन स्वामी विवेकानंद के बारे में नहीं सोचते होंगे. उन्हें कतार न टूटने, माड़साब या बहिन जी के आदेशों की चिंता रहती होगी या फिर वे मूंगफली ठेलों और चाट पकौड़ी वालों तक भाग जाने की फिराक में रहते होंगे. अब बच्चों को थोड़ा और दूर तक जाना होगा कि ये जगह बचेगी नहीं.
दोस्त के ख़त के इंतजार में शाम काटने या फिर पावती लिखने के लिए छत से उपयुक्त कोई जगह नहीं होती. मैं घर की छत से इस चौराहे को बरसों तक देखता रहा हूँ. अब भी सामने दिख रहा है. पहाड़ी की तलहटी में बसावट से आगे बढ़ता हुआ, ये रेगिस्तानी क़स्बा अब कई किलोमीटर तक फ़ैल गया है. कई हज़ार करोड़ के निवेश से यहाँ के आदमी से सुकून और रेत से तेल निकाला जा रहा है. ये कस्बा शहर होने की प्रसव पीड़ा से गुजर रहा है. वाहनों की तादाद अविश्वसनीय रूप से बढ़ गई हैं. ट्रेफिक को दुरस्त करने के लिए कोई पच्चीस करोड़ की लागत से एक ओवर ब्रिज का काम शुरू हो गया है.
इस चौराहे के बीच में एक पीपल का पेड़ भी है हालाँकि रात में पीपल के पत्तों की आवाज़ें भूतहा ध्वनियाँ बिखेरती होंगी लेकिन दिन भर यहाँ लोक गायक मांगणियार बैठे रहा करते हैं. ये उनके मिलने का स्थान है. यहीं पर भारू की चाय पीने के लिए शहर जुटा करता है. लकड़ी की बेंचों पर बैठे हुए मात्र बीस रुपये में बाजरा के दो सोगरे, खट्टा रायता और कोई एक सब्जी यहीं मिला करती है. दो चार साल पहले लगे पानी के फव्वारे के पास शाम बिताते हुए कई नए नवेले परिवार दिखते रहा करते हैं.
कल शाम हम वोलीबाल खेलने जा रहे थे कि मोहवश मैंने बाईक को रोक दिया और नौ साल के बेटे से कहा “छोटे सरकार, अब कैसा दिख रहा है चौराहा ?” उसने पूछा कि “ऐसा हो क्यों रहा है ?” मैंने उसके प्रश्न को नज़र अंदाज करते हुए फिर पूछा “क्या ये चौराहा आपको याद रहेगा ?” वह बची हुई लोहे की रेलिंग पर हाथ रखे हुए कहता है “शायद रहेगा…” उसने फिर आस पास देखा और पूछा “पापा, यहाँ से और क्या-क्या चीजें हटा दी जाएगी ?” मैंने कहा “बेटा दिल्ली में बैठे हुए लोग जंगलों से आदिवासियों को, समन्दरों से मछुआरों को और रेगिस्तानों में रहने वाले ऊंट जितने लम्बे लोगों को हटा देंगे. सदियों से यहाँ रहने वाले ये लोग जाहिल और गंवार हैं. ये विकास की राह के रोड़े हैं. ” मुझे ऐसा नहीं लगा कि उसे कुछ समझ आया है लेकिन मैं चाहता हूँ कि इस चौराहे की याद उसके मन में बनी रहे.
इस चौराहे से कितनी बार मैं अपने पिता के साथ उनकी सायकिल पर, फिर स्कूटर और फिर कार में पीछे बैठे हुए निकला हूँ. उनकी यादें मेरे साथ आजीवन रहेगी, उनमे कहीं ये चौराहा भी होगा. सोचूं तो लगता है कि कोई बड़ी बात नहीं, इसे थोड़ी ही दूर फिर से बना दिया जायेगा. इससे आगे की सोच मुझे परेशान करती है कि क्या उस नई जगह से मेरा कोई जुड़ाव होगा या यही घूम चक्कर सपनों में आता रहेगा. मैंने पाठ्यक्रम से बाहर की पहली पुस्तक स्वामी विवेकानंद की ही पढ़ी थी. मेरे पिता के संग्रह में इतिहास की पुस्तकों के अलावा दयानंद सरस्वती और स्वामी विवेकानंद की पुस्तकें थी. उन्होंने बड़े सलीके से मुझे पहले इन्हें ही पढने को प्रेरित किया था. स्कूल के आखिरी दिनों में उन्होंने मेरा मार्क्स से परिचय करवाया था. चौराहे पर खड़ी गेरुए वस्त्र वाली प्रतिमा, मेरे जीवन का हिस्सा है. ये एक जिद भी है कि मैंने इसे जहाँ देखा है, इसे वहीं होना चाहिए.
दोस्त तुम कुछ समय पहले आये होते तो मैं तुम्हें दिखाता कि ये विवेकानंद सर्कल है. इससे पूर्व की ओर सौ मीटर के फासले पर बैठे गाडोलिया लुहारों के बीच मेरे पिता का बनाया हुआ घर है. इस बदलते हुए पते के बीच मुझे नासिर काज़मी साहब की कही और गुलाम अली साहब की गाई ग़ज़ल याद आने लगती है. ग़ज़ल से पहले के शेर को सुनते हुए मैं अक्सर सोचता हूँ कि मेरे पिता इस रास्ते से ही चले आ रहे हैं. ओह पापा, मुझे आपकी याद बहुत रुलाती है. मैं उन रास्तों को सलामत देखना चाहता हूँ, जो आपके पांवों के निशानों से सजे हुए थे.

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