नुसरत, सलेटी जींस, हवेलियाँ

ओ वादा शिकन…

आजकल, जाने क्यों आवाज़ें बड़ी साफ़ सुनाई देने लगी है.
बाहर गली में किसी के पाजेब की रुणझुण कदम दर कदम करीब आती हुई सुनाई पड़ती है फिर किसी के चलने की कुछ आहटें है और कभी दिन भर, सांझ की राग सा बच्चों का शोर खिड़की तक आकर लौट जाता है. कितने सफ़र, कितने रास्ते उलझ गए हैं. बेचैन रहा करने के दिन याद आने लगे हैं. सलेटी जींस और ऑफ़ वाईट शर्ट पहने घूमने के दिन. ऑफिस, घर या बाज़ार सारा दिन होठों को जलाते हुए सिगरेट के कई पैकेट्स पीना ज़िन्दगी के कसैलेपन को ढक नहीं पाता था लेकिन खुद को राख सा बिखरते हुए देखना सुख देता था.
अकेलापन यानि पत्तों के टूटने की आवाज़, टूटन को सुनना माने एक लाचारी. वे उसकी आवारगी के दिन नहीं थे. कुलवंत की दुकान से सुबह शुरू होती और दिन सिगरेट की तरह जलता ही रहता. रात होते ही शराब फिर सवेरे उठ कर बालकनी में आता और देखता कि गाड़ी कैसे खड़ी है. अगर वह सही पार्क की हुई मिलती तो शक होता कि रात को खाना खाने गया ही नहीं. अपने हाथों को सूंघता. अँगुलियों के बीच खाने की खुशबू होती तो लगता कि कल सब ठीक था. सरकारी फ्लेट पर वह इतनी पी चुका होता कि दुनिया के सारे खौफ गायब हो जाते. उसे अपनी पहचान भूलने लगती और अक्सर रोने लगता. बी एल पीठ थपथपाता हुआ, एक गाली देता. ‘साली…’ फिर एक छोटे से पॉज के बाद कहता “किसी के साथ गुजर कर लो पर एक वही …” पलकों पर ठहरे हुए आंसू ज्यादा देर ठहर नहीं पाते. बी एल फिर ऐलान करता कि चलो अरोड़ा के…वहीं चिकन खायेंगे और पियेंगे.
वह कुछ भी पी लेता. देसी – विलायती, कच्ची या पक्की. अरोड़ा के ढाबे पर नियमित जाना था तो दो स्टील के ग्लास आ जाते. कांच के ग्लास में पीनी होती तो होटल के ऊपर नौकरों के लिए बने कमरे में जाना होता. ज़िन्दगी भी दो हिस्सों में बंट गई थी जिसके एक तरफ कांच और दूसरी तरफ स्टील के ग्लास थे. जितना पीते जाते उतने ही शालीन होते जाते. दुःख दर्द डूबने लगते. पीते हुए हमेशा होटल के सामने का एस टी डी बूथ ही दीखता रहता. ” मैं कल जा रहा हूँ.” ऐसा कहते हुए उठने को होता तभी बी एल हाथ पकड़ लेता “रात के बारह बज चुके है अब उसको फोन मत करो…” रात डूब जाये, इससे पहले कुछ और पी ली जाये.
सुबह पांच बजे बस स्टेंड पर टहल रहा होता. जो भी बस मिलती उसमे बैठ जाता. मीलों पसरी हुई रेत, धूप में चमकती. कई सौ किलोमीटर का सफ़र. पानी की तलब साथ चलती रहती. तीन बार बस बदलता और हर बस के आखिरी स्टॉप तक का यात्री हुआ करता. सवारियां उतरती और चढ़ती जाती. सर्दियों में ठण्ड से अकड़े हुए तलवों को अपने जूतों में हिला कर गरम करने की कोशिश करता. कभी बस का ड्राइवर किसी स्टेंड पर जलते हुए अलाव के पास रोकता तब अपने पांव सेकना नहीं भूलता. गरमियां होती तो लू बदन को चीरती रहती. एक गरमी की दोपहर में स्टेंड पर पानी पीने के लिए उतरा तो ड्राईवर ने कहा “भाई ये पानी तुमसे पिया नहीं जायेगा.” वह बहुत खारा पानी था जैसे नमक के दो चमच एक ग्लास पानी में घोल दिये गए हों. वह आधा जग पानी पी गया. ड्राईवर ने पूछा “कहां के रहने वाले हो.” कहा “इस रेगिस्तान के आखिरी छोर का…”
रंगीन हवेलियों वाले देस में शाम उतरती जाती. बिस्तर पर लेटा हुआ उसे देखता. खिडकियों पर कबूतर बैठे रहते और वह आलू छीलती हुई दो एक बार उजड़ी निगाह डालती हुई अपने काम में लगी रहती. रात बरसती रहती और वह उसकी छातियों में सर रखे हुए रोता ही जाता. ओ वादा शिकन… इन दिनों फिर वही आवाजें है और वह फिर से टूट रहा है.

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