प्रेम, याद

अलग किस्म की याद जैसे ‘साही’ की पीठ पर काला सफ़ेद तीर

घड़ी की पुरानी सुइयों जैसे टूटे फूटे पल. जिनमे तेरी खुशबू सुनाई देती, अब मंदिर की सीढ़ियों के किनारे लगे लेम्प पोस्टों में बदल गए हैं. शाम होते ही जलते बुझते रहते हैं. मेरी आँखें, उन्हें अपलक निहारने में कोई कष्ट नहीं पाती. वे पहाड़ी के विस्तार पर उन लम्हों की याद ताजा करने को अटकी रहती है, जब तुम्हें हर बार सायास कहीं से छू लिया करता था और तुम मुड़ कर नहीं देखती थी. उसी मुड़ कर न देखने से उपजने वाली मुहब्बत की फसल अब बरबाद हो चुकी है.

धरती पर पहाड़, इंसान में प्रेम की तरह है. प्रेम और पहाड़ दुनिया में हर जगह पाए जाते हैं यहाँ तक की भयावह सूने रेगिस्तानों में भी, कहीं ऊँचे, कहीं चपटे और कहीं ‘डेड ऐंड’. बस ऐसे ही हर कोई एक दिन उस डेड ऐंड पर खड़ा हुआ करता है. कुछ के हाथ में नरम भीगी अंगुलियाँ होती है जो आगे की गहराई को देख कर कसती जाती है और ज्यादातर मेरी तरह तनहा खड़े हो कर सोचते हैं कि अगर तुम यहाँ होती तो मेरी बाँह को थामे हुए इस गहराई को किस तरह देखती.

मेरे पास बहुत कुछ बचा हुआ है. उसमे एक जोड़ी सेंडिल की तस्वीर भी है. किसी पहाड़ पर बने मंदिर के आगे आराम करने को बनाई गई पत्थर की बेंच के ऊपर रखी हुई सेंडिल, कैसा पागलपन है कि मैं ऐसी तस्वीर को अभी भी सहेज कर बैठा हूँ. अब तुम्हारे दो बच्चे तो होंगे ही… फिर रात होने को है तो जाहिर है कि उनके डिनर की तैयारी चल रही होगी. सोचता हूँ कि किचन में जब तुम सब्जी काट रही हो तब वह भी तुम्हारे कंधों पर हाथ रख कर मेरी तरह खड़ा होता होगा… फ़िर ख़याल आता है कि अब उसने रसोई में प्यार जताने पर भड़क जाने वाली आदत जरूर बदल ली होगी. ऐसा इसलिए सोचता हूँ कि मैंने अपनी बहुत सी आदतें बदल ली हैं.


आदमी दुनिया में सीखने आया है, पिछले दस सालों में मैंने भी सीखा कि अन्तरंग क्षणों में कहो ‘आई लव यू’ और इसे याद रख कर कहो, फिर उसकी तरफ देखते हुए मुस्कुराओ और आहिस्ता से अपनी आँखें बंद कर लो. जिंदगी इस एक काम से स्मूथ राईड की तरह हो जाती है… तुम परेशान ना होओ… कि दुनिया में कई लोग हैं मेरे जैसे, जो असंभव को जीने की उम्मीद से जीये जाते है.

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