ईथोपिया, कवि, नज़ीर बनारसी, मास्टर

दोस्त ज़ोर्ज, एक मास्टर कवि ने तुम्हारी याद दिला दी

अमेरिकी प्रशासन ने पिछले साल सब नियोक्ताओं से आग्रह किया था कि वे अपने अधिकारियों को निर्देश दें कि फेसबुक पर कम से कम जानकारी सार्वजनिक करें, मुझे लगा कि अमेरिकी प्रशासन की फट रही थी लेकिन दो दिन पहले एक मास्टर कवि मेरे फेसबुक एकाउंट पर आकर ‘टाबर समझे खुद ने बाप बराबर’ बता गए तो अब मेरी भी फट रही है. मेरे लिए राहत की बात ये है कि वे मेरे से उम्र में दस साल बड़े है. इस बहाने से मैंने बर्दाश्त करने का हौसला फिर से पा लिया. फेसबुक पर एक ऑप्शन है कि वह अपने सदस्यों को मित्र सुझाने की सुविधा देता है तो मेरे पिताजी के एक मित्र जो वरिष्ठ साहित्यकार हैं और दूरदर्शन के बड़े पद से सेवा निवृत हुए हैं, उन्होंने मुझे सुझाया कि इन्हें आप अपना मित्र बना सकते हैं. उनके सुझाव को मानने के बाद अब सोचता हूँ कि यार इससे तो अच्छा था कि इथोपिया में पैदा होते और लोगों की सहानुभूति के साथ मर जाते.

रात नौ तीस पर छत पर आया था, चाँद ठीक ज्योमेट्री बक्से के चंदा जैसा था अनुमान हुआ कि आज सप्तमी के आस पास का कोई दिन होगा. कल मेरा एक मेहरबान ग्रीन लेबल की दो बोतल पहुंचा गया था. वैसे आप ठेके से लेकर पिए तो जो चाहे ब्रांड ले सकते हैं मगर दो नंबर की दारू के लिए आपको समझौते करने पड़ते हैं. केंद्र शासित प्रदेश चंडीगढ़ के लिए बिकने वाली शराब हमारे यहाँ अवैध रूप से बिकती है, जिसके दाम बाज़ार कीमत से ठीक आधे होते हैं यानि आप को सौभाग्य से एंटीक्यूटी की खेप में हिस्सेदारी मिल जाये तो उसके दाम होंगे मात्र तीन सौ रुपये प्रति बोतल. मैंने सलाद के लिए आज खीरे को छोड़ दिया और उसकी जगह बेरे की देसी ककड़ी को लिया, कभी पीते हुए आपने भी खायी होगी तो उसका स्वाद अभी तक नहीं भूले होंगे ऐसा मेरा विश्वास है. दक्षिण एशिया का ये सबसे गरीब व्यक्ति बस ऐसे ही काम चलाता है कि अवैध बिकने वाली दारू और देसी ककड़ी खाकर सो जाया करता है तो फिर कैसे किसी बुद्धिजीवी की पंक्ति का उत्तर दे.

अफ्रीका के नक़्शे में एक गेंडे के सींग जैसा क्षेत्र बनता है उसका केंद्र है ईथोपिया. आप जोर्ज रुदबर्क को नहीं जानते होंगे वैसे मैं भी अपने मोहल्ले के बहुत से लोगों के नाम नहीं जानता. ज़ोर्ज एक शाम दिल्ली के संसद मार्ग के किनारे लगी लोहे की रेलिंग से सहारा ले कर खड़ा था मजे की बात है कि मैं भी इसी मुद्रा में था. मुझे वह पहली नज़र में स्मेक के सौदागर जैसा दिखा किन्तु थोड़ी सी जान पहचान के आध घंटे बाद हम दोनों एक सामान्य स्तर के बार में शराब पी रहे थे.

उसने मुझे पूछा कि तुम कहाँ रहते हो मैंने कहा बहुत गर्म प्रदेश में वह जरा चौंका मगर उसने कहा कि कभी दल्लोल आना फिर पता चलेगा कि गर्मी क्या है ? मेरे पचास रुपये बर्बाद हो गए, दो पिए हुए पैग उतर गए क्योंकि मैं थार के मरुस्थल की गरमी को दुनिया का आखिरी सच मान रहा था. मैं समझता था कि काफी बीन्स के लिए अमेरिका उपयुक्त जगह है मगर उसने बताया कि इथोपिया एक नंबर है, सोचा था कि हमारा लोकतंत्र प्राचीन है मगर उसका देश तो दुनिया के प्राचीनतम स्वतंत्र देशों में से एक है. मैंने अपनी सभ्यता के बारे में उसे बताया, उसने बड़े ध्यान से सुना मगर फिर बोला कि हमारे देश की सभ्यता की गणना ईसा से दस शतक पूर्व से की जाती है.

मैंने बताया कि हिमालय और नीचे कन्या कुमारी जैसी विविधता हमें ख़ास बनाती है, उसने नम्रता से कहा कि अफ्रीका की सबसे ऊँची चोटियाँ उसके देश में हैं, हरियाली है, सबसे सुन्दर प्रपात है, गर्म पानी के अद्भुत चश्मे हैं और इस सुन्दरता को गाने के लिए हेमेमल अबेत से लेकर महमूद अहमद जैसे लोग ईश्वर ने उस धरती को दिए हैं. उसने एक ब्राजीलियन शराब की मांग की मगर वह उस बार में नहीं थी तो उसने हल्की और सस्ती शराब पर हामी भरी थी. मैंने उस दिन विस्की ही ली थी मगर वह भी नाकामयाब रही क्योंकि जब मैंने उसे बताया कि तुम और तुम्हारा देश अद्भुत हो तो वह अपना ग्लास खाली करते हुए बोला मैं भूखे और बेबस लोगों के देश से आया हूँ. मैं फिर हार गया था, वह हर मामले में अद्भुत था गरीबी के मामले में भी. उसने कहा मेरे देश में कुछ भी प्रगतिशील नहीं है इस्लामिक, जेविश और क्रिस्तान सब घोर रुढ़िवादी है फिर भी इथोपिया है. वह भूखे नंगे लोगों का देश पूँजीवाद की जूती नहीं है.

मेरे पिता कि तरह ज़ोर्ज कवि नहीं था मगर मास्टर था, वह शराब से प्यार नहीं करता था , वह समाज को खूबसूरत देखना चाहता था ठीक मेरे पिता की तरह, सबसे बड़ी बात कि उसने मेरा पिता बनने की कोशिश करने की जगह दोस्त बन कर बताया कि अभी तुम्हारी उम्र कच्ची है और दुनियावी तालीम अभी बाकी है. ज़ोर्ज आज बीस साल बाद भी मुझे तुम्हारी याद है. ये भी नहीं भूला हूँ कि तुम अपने देश की सोमालिया को छूती सीमा रेखा के पास किसी गाँव में रहते हो जैसे मैं भी. आज तुम यहाँ होते तो हम ग्रीन लेबल विस्की पी रहे होते.

इन दिनों रोज़ ही पीता हूँ मगर अपने दोस्त को फोन नहीं करता ताकि उसे मालूम हो कि शराब पी कर ही तुम्हारी याद नहीं आती है. नज़ीर बनारसी की एक ग़ज़ल मुझे बहुत पसंद है ये करें या वो करें, ऐसा करें, वैसा करें… आज उन्हीं का एक शेर


जहाँ ठहरे क़ल्ब-ए-मुज़्तर वो नज़ीर मेरी मंजिल
जहाँ रुक के सांस ले लूं वही मेरा ठिकाना
Advertisements

Leave a Reply

Please log in using one of these methods to post your comment:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s