इब्ने इंशा, गिब्रेलपेरी, गुडाळ, गुरुद्वारा कबूतरसर

जियें तो जहाँ में दिमित्रोफ़ होकर

कल का दिन बहुत उमस भरा था. मौसम में आर्द्रता बढ़ रही होगी वरना नम भीगी आँखों की नमी महसूस करने के दिन अब कहाँ है. ऐसे दिनों में ये बहुत पहले की बात नहीं है जब किसी राह से गुजरते हुए इंसान को उदास देख कर ही लोग उदास हो जाया करते थे. मन उन दिनों गीले थे. सूत के रंगीन धागों से बनी खूबसूरत बावड़ियों वाली चारपाइयों के पाए भी कद में कुछ ऊँचे हुआ करते थे. वे जाने किसके इंतजार में घर के बाहर बनी गुडाल ( मेहमानों का कमरा/विजिटर्स रूम) में आम चारपाइयों से अलग खड़ी ही रहा करती थी. मैं जब भी गाँव जाता, यही सोचता कि आखिर कब बिछेगी ये चारपाई ? मेरे कौतुहल का सबसे बड़ा प्रश्न रहता कि जिस चारपाई पर घर के सबसे बड़े इंसान को सोते हुए नहीं देखा उस पर जरूर कोई फ़रिश्ता कभी सोने के लिए आएगा.

मेरे ताऊ जी जब मौज में होते तो अपनी सफ़ेद दाढ़ी बढ़ा लिया करते थे. उस फरहर सफ़ेद दाढी के बीच मूंछें इतनी पतली करवा लेते कि मुझे पांचवी की किताब में देखी गयी चीनी यात्री की तस्वीर याद आ जाती. खेती बाड़ी के बाद के दिनों में, उनके ढेरिये घूमते रहते और रंगीन सूत के सुंदर गोले बन जाते. उन गोलों को वे इतने प्यार से खूँटी पर टांगा करते थे जैसे कि मुझे गोदी में उठा रहें हों. हिरण का एक सींग सूत की चारपाई बुनने में काम आता था. वह काले रंग का आधे बूमरेंग सा हथियार अधबुने सूत के धागों के बीच अपने काम की प्रतीक्षा में लटका ही रहता था. लेकिन कभी वह चारपाई बिछी नहीं. मैं सच में देख लेना चाहता था कि उस पर सोने से क्या ख़ास बात होगी ?

मैं कुछ बड़ा हुआ तो समझ पाया कि वे सुंदर चारपाइयां मनुष्य के श्रमजीवी होने की निशानियाँ हैं. आगंतुक उनको देख कर व्यक्ति के श्रमशील होने का आभास पाता है. कोई पच्चीस साल पहले जिस घर में सुंदर चारपाइयाँ न दिखाई दे वहां के रिश्ते भी ठुकुरा दिये जाते थे. आलसियों के घर में बेटी को ब्याहना भला कौन चाहेगा. साधू – सन्यासी या फिर महंत या समधी के घर से बहुत ही बुजुर्ग पधारते तब वे चारपाइयाँ उनके आदर में बिछाई जाती रही हैं मगर मैं कभी देख नहीं पाया. हम मौसम आधारित खेती करते आयें हैं इसलिए साल में तीन महीने से अधिक काम नहीं होता. शेष समय में औरतें घर में गोबर का आँगन बिछाने, गाय बकरी और भेड़ को पालने और उसी आँगन में बच्चों को खेलने पर डांटने का काम किया करती हैं. वे चारपाइयाँ और रंगीन ओढ़णियों के घूंघट में छिपी हुई मेरी माँ, ताई और चाचियाँ, मनुष्य के लगनशील – श्रमजीवी होने के प्रतीक के रूप में मेरे मन में अभी भी बसी हुई है.

कभी चूरू जिले में जाना हों तो गुरुद्वारा कबूतरसर के बारे में पूछियेगा. ये स्थान साहवा साहब के रास्ते में आएगा. ऐसे भयानक रेतीले बीहड़ में कबूतर पालने के बारे में जान कर मुझे आश्चर्य हुआ था. कोसों दूर पानी का ठिकाना नहीं था मगर आदमी के जीवट से बड़ा कुछ नहीं होता. जो आदमी कबूतर पालता था, उसी का एक कबूतर गुरु गोविन्द सिंह जी के घोड़े के पांव के नीचे आ गया था. वहीं पर गुरु साहिब ने उस बन्दे को ज़िन्दगी और मौत के बारे में बताया था शायद इसीलिए गुरुद्वारा कबूतरसर के नाम से जाना जाता है. ये एक श्रुत कथा है किन्तु वहीं पास में एक जाट के घर पर चारपाई है. जिसे चार लोग मिल कर नहीं उठा सकते. उसने इस चारपाई को अपने कठोर परिश्रम से बनाया था. गुरु गोविन्द सिंह जी का काफिला जब वहां से निकाला तब उन्होंने उस चारपाई पर विश्राम किया था. वह चारपाई अब भी है और शायद तब तक रहे जब तक कि इंसान के भीतर संवेदनशील श्रम साधक बचा रहे.

मनुष्य की स्वाधीनता और रचनात्मक स्वाभिमान के प्रबल पक्षधर शाईर शेर मोहम्मद खां जिनको हम इब्ने इंशा के नाम से जानते हैं उन्होंने नाजियों के हाथों मारे गए फ़्रांस के क्रांतिकारी गिब्रेलपेरी और बुल्गारियन कम्युनिस्ट दिमित्रोफ़ को अपना गर्व माना है. मेहनतकश अवाम के लिए कही गयी ये खूबसूरत पंक्तियाँ देखिये.

जो मजदूर है उनको मेहनत का हासिल, जो दहकान है उनको खेती दिलाएं,
मरें तो मरें मिस्ले गिब्रेलपेरी, जियें तो जहाँ में दिमित्रोफ़ होकर.
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