आर एस हरियाणवी 'रतन', लोकगीत

म्हें होग्यो फोफलियो

मिनिट मेड न्यूट्री लेमन की बोतल ख़त्म होने को थी तो सोचा कि थोडा सा ज़िन कल के लिए बचा लिया जाये. इसी उधेड़बुन में एक नीट पैग गले उतर गया. धुआं सा कुछ मुंह से उठा और आह बन कर हवा में खो गया. मेरी वाईफी आज मेरे लिए रेशनल कारपोरेशन के स्टोर से कुछ ख़ास किस्म के स्नेक्स लायी थी, वे भी कमबख्त और आग लगाने से नहीं चूके. अब आईस क्यूब का सहारा है और कल के हसीं दिन की ख़ास यादों का, जिनमे दोस्त तेरा दिल धड़कता था.

अपने मोबाइल फोन के पास सफ़ेद चने रखता हुआ सोचता हूँ कि जल्दबाजी की वजह है नयी फसल के नए फल. कल सांगरियों की सब्जी बनी थी यानि मरुभूमि के कल्प वृक्ष खेजड़ी के फल की. उस सब्जी के बारे में सोचते हुए मुझे रतन सिंह जी की याद हो आई यानि आर एस हरियाणवी ‘रतन’. आपने कभी अहमद हुसैन मोहम्मद हुसैन की आवाज़ में ग़ज़ल सुनी हो “सीने में समंदर के लावे सा सुलगता हूँ, मैं तेरी इनायत की बारिश को तरसता हूँ, चन्दन सा बदन उसका खुशबू का समंदर था, एक बार छुआ लेकिन अब तक महकता हूँ…” तो ये शाईर हैं जनाब रतन हरियाणवी.

हरियाणवी जी से मैं साल निन्यानवे में मिला था. वे तब आकाशवाणी में उप निदेशक हुआ करते थे. उनके सम्मान में आयोजित एक सांस्कृतिक संध्या में मैंने कुछ राजस्थानी में कविताओं के टुकड़े पढ़े थे. उस जिंदादिल शाईर ने मेरी पसंद की कविताओं के शब्दों पर गहरी साँसें ली थी और फिर एकांत में मुझसे उनके सन्दर्भ में बात भी की थी. उन्होंने राजस्थान में बहुत नौकरी की मगर जिन कवियों की पंक्तियाँ मैं बोल रहा था वे उनके लिए अद्भुत थी.

शराब पीते वक्त जाने क्यूं आज एक और मुराद दोस्त की याद आ रही है मगर वह अभी ऑनलाइन नहीं है. खैर मैं सांगरी और हरियाणवी जी की बात कर रहा था. उस नेक दिल इंसान ने मुझसे राजस्थान के लोकगीतों के बारे में बहुत देर तक बात की, मैंने उन्हें कहा कि आपको एक शेर सुनाता हूं जो राजस्थानी लोक गीत का दोहा है लेकिन इसमें सब शेर को चित्त करने का सामर्थ्य है.

डूंगर माथे डूंगरी जी कईं सोनों घड़े सुनार
बिछिया घड़ दे बाजणा, म्हारी पायल री झंकार.

इस गीत में नायिका कह रही है, हे सुनार, कुदरत ने इतना खूब रचा है कि पर्वत के ऊपर पर्वत खड़े कर दिए हैं तुम अपनी कला रहने दो, मेरे लिए बजने वाले बिछिये घड़ दो ताकि पायल मनभावन आवाज़ में बजने वाली बन जाये. ये लोक गीत है, हिचकी… उन्होंने बताया कि मैंने गीत हज़ार बार सुना मगर इस पक्ष को नहीं देखा.

जिस कविता पर वे संजीदा हुए वह आज़ादी के पचास वर्षों का मखौल उड़ाती है. समय के साथ अपेक्षाएं बढ़ी है किन्तु वे जायज हैं कि हम सब का भला कुछ नहीं हुआ है. सूखे हुए काचर को फोफलिया कहते हैं. अब बिम्ब देखिये कि एक खेजड़ी के फल और बरसात में होने वाले काचर के जरिये कवि क्या कहता है ?

आजादी मिलियाँ पछे न म्हें पाँग्र्यो, न थूं पांगरी
म्हें होग्यो फोफलियो अर तूं होगी सांगरी।

इस कविता में कवि कहता है कि आज़ादी मिलने के बाद न मैं फला फूला न ही तुम, मैं तो सूख कर फोफलिया हो गया हूँ और तुम एक सूखी हुई सांगरी, यानि दोनों के बदन का रस चूस लिया गया है. रतन हरियाणवी साहब बहुत दिनों तक दुनिया के रंजो-गम में नहीं रहे. वे मुझे अपने घर एक शाम बिताने को आमंत्रित कर गए थे मगर उनके पास बहुत कम शामें थी. आज जब फिर से मेरी स्वीट वाईफी ने सांगरी बनाई है मैं उनको याद करते हुए रो पड़ा हूँ और मेरा आज का आखिरी पैग पूरा होने को है काश वे इसे पूर्णता देते ?

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